क्या है त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का रहस्य | Know History And Significance Of Trimbakeshwar Jyotirlinga

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से सृष्टि के आरंभ मे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का योगदान सर्वाधिक रहा है। समस्त सिद्धियो को देने वाले महादेव कि आराधना सिर्फ मनुष्य और देवता ही नही अपितु वानर, दैत्य, गंदर्भ,असुर, तथा किन्नर भी करते है। शिव पुराण कि कोटीरूद्र संहिता के अंतर्गत महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के महत्व को बताया गया है। जो कि भारत के अलग-अलग राज्यो मे स्थित है।

इस लेख मे हम जानेंगे कि आखिर क्या है इन ज्योतिर्लिंगों के स्थापना कि कथा साथ ही क्यों है इसकी इतनी महत्ता। इस लेख के माध्यम से महाराष्ट्र के नासिक में स्थित त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास करेंगे।

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

त्रयम्बकेश्वर महादेव मंदिर नासिक में त्रयम्बक नामक स्थान पर  ब्रह्मगिरि पर्वत के पास स्थित है।

शिवपुराण की कोटिरुद्र संहिता के अंतर्गत इस मंदिर की स्थापना का उल्लेख मिलता है जो की इस प्रकार से है।

प्राचीन काल में इस स्थान पर अनेको वर्षो तक वर्षा नही हुई थी। जिसके कारण यहाँ भयंकर सूखा पड़ा और यहाँ के निवासी दूसरे स्थानों पर पलायन करने लगे। उसी समय ऋषि गौतम ने घोर तपस्या कर वरुणदेव को प्रसन्न किया । ऋषि की तपस्या को देख वरुण देव ने ऋषि को एक गढ्ढा खोदने को कहा और उसे अपने दिव्य जल से भर दिया। इस जल से उस स्थान पर पुनः हरियाली आने लगी और पलायन करने वाले सारे निवासी पुनः उसी स्थान पर वापस आ गए।

एक दिन की बात है जब ऋषि के कुछ शिष्य उस तालाब में पानी भरने के लिए आये उसी वक़्त कुछ ब्राह्मण कन्याएँ भी वहां पहुंची और उनसे पहले पानी भरने का हट करने लगी। इस पर ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या वहां आयी है उन ब्राह्मण कन्याओं से आग्रह करने लगी की ये सभी शिष्य पहले यहाँ आये है कृपया इन्हें पहले पानी भरने दिया जाए। इस पर उन सभी ऋषि पत्नियों ने सोचा की माता अहिल्या इस बात पर अपने शिष्यों का पक्ष ले रही है क्योंकि इस दिव्य जल की व्यवस्था इनके पति ऋषि गौतम ने करवाई है।

इस पुरे काण्ड की कहानी ऋषि पत्नियों ने अपने पतियों को बहुत बढ़ा चढ़ा कर बताई और सभी दुष्ट ऋषियों ने गौतम ऋषि से बदला लेना चाहा । और इसके लिए उन सभी ऋषियों ने भगवान गणेश की मदद ली । भगवान् गणेश की घोर तपस्या कर इन ऋषियों ने गौतम ऋषि से बदला लेने का निश्चय किया। इस पर भगवान् गणेश ने उन सभी मुनियों को समझाते हुए कहा कि ऐसे परम आत्मा से द्वेष रखना उचित नही है। इसका परिणाम अत्यन्त बुरा हो सकता है। परंतु ऋषियों के हट करने के कारण गणेश भगवान् ने उन मुनियों की आज्ञा मान ली।

इसके कुछ दिनों के बाद भगवान् गणेश एक दुर्बल गाय का भेष धारण कर गौतम ऋषि के धान के खेत में आये । जिसे देख गौतम ऋषि उस गाय के पास जाकर उसे  अपने हाथों से चारा खिलाने लगे। ऋषि के द्वारा खिलाये गए चारे के स्पर्श मात्र से वह गाय मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी और वहिं उसकी मृत्यु हो गयी। अन्य दुष्ट मुनि जो उस वक़्त उसी स्थान पर छुपे हुए थे अचानक से सामने आये और ऋषि गौतम को कोषने लगे और उनके ऊपर गौहत्या का पाप मढ़ने लगे। इन सब ऋषियों ने अब गौतम ऋषि को अपमानित कर गाँव छोड़ने को कहा जिससे गौतम ऋषि ने वह स्थान छोड़ दिया और वहां से दूर एक कुटि में रहने लगे। परंतु वहां भी उन दुष्ट ऋषियों ने उनका पीछा नही छोड़ा और ऋषि से कहने लगे की तुमने गौ हत्या जैसा पाप किया है इस पाप से निर्मुक्त होने के लिए तुम्हे  तीन बार पृथ्वी की परिक्रमा कर वापस इसी स्थान पर आकर पुरे 1 माह तक व्रत करना होगा इसके साथ ही तुम्हे ब्रह्मगिरि पर्वत की 101 बार प्रतिक्षणा भी करनी होगी तभी तुम्हारी शुद्धि हो सकेगी। या  फिर इस जगह पर माता गंगा को लाकर उसमे स्नान करो और महादेव की पूरी 1 करोड़ पार्थिव शिवलिंग बना कर उनकी आराधना करो तत्पश्चात ब्रह्मगिरि पर्वत की 11 बार परिक्रमा कर 100 घड़ो के जल से इन सभी पार्थिव शिवलिंगों का अभिषेक करो तब जाकर ही तुम्हे गौ हत्या जैसे पाप से मुक्ति मिल सकती है।

ऋषियों के कहे अनुसार ही गौतम ऋषि ने महादेव का पार्थिव शिवलिंग बना कर उनकी आराधना शुरू की इस तप में ऋषि की पत्नी अहिल्या ने भी उनका पूरा साथ दिया।

गौतम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव ने उन्हें अपने दिव्य दर्शन दिए और ऋषि से वर मांगने को कहा। इस पर ऋषि ने गौ हत्या के पाप मुक्ति हेतु वर मांगा। इस पर महादेव बोले हे ऋषि अपने कोई पाप किया ही नही है। उन सभी दुष्ट ऋषियों नेे द्वेष पूर्वक यह षड़यंत्र रचा था। आप सदा ही निष्पाप रहे है। भगवान् के मुख से यह वाणी सुन ऋषि संतुष्ट हुए और उनसे कहने लगे कि अगर इन मुनियों ने यह छल नही रचा होता तो मुझे आपके दर्शन भी न होते इसलिए हे महादेव अगर आप मेरी तपस्या से प्रसन्न है तो यहाँ माँ गंगा को प्रकट करे। ऋषि के आग्रह से भगवान् शिव ने गंगा से इस स्थान पर  प्रकट होने का निवेदन किया इस  पर माँ गंगा ने कहा कि मैं तभी इस स्थान पर प्रकट होंगी जब स्वयं महादेव अपने परिवार और समस्त देवताओं के साथ यहाँ वास करेंगे। महादेव ने तथास्तु कहा और सभी देवों ने कहा कि प्रत्येक वर्ष जब बृहस्पति देव सिंह राशि में प्रवेश करेंगे तो इस स्थान पर सभी देवताओं का वास होगा। जिससे माँ गंगा उस स्थान पर प्रकट हुई और विश्व में गोदावरी के नाम से जानी गयी और महादेव का यह लिंग स्वरुप संसार में त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ।

इस लेख मे हमने नासिक में स्थित त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा का सार विधिपूर्वक बताया है। अन्य ज्योतिर्लिंगों के स्थापना संबन्धित कथाएँ आगे के लेख मे पढ़ने को मिलेगी।