धरती का बैकुंठ है बद्रीनाथ धाम, एक बार जरूर करें भवगवान विष्णु की नगरी की यात्रा, बहुत कुछ खास है यहां पर

विष्णु के इन पांच रूपों में बद्रीनाथ, श्री विशाल बद्री, श्री योग-ध्यान बद्री, श्री भविष्य बद्री, श्री वृद्ध बद्री और श्री आदि बद्री प्रसिद्ध है। सबसे रोचक बात यह है कि बद्रीनाथ मंदिर में गाई जाने वाली आरती लगभग 132 वर्ष पुरानी है।
लोक कल्याण के लिए साधना में बैठे हैं श्री हरि
पृथ्वी पर साक्षात भू बैकुंठ के नाम से श्री बदरीनाथ धाम की पहचान है। भारत के चारधामों में एक उत्तर हिमालय में बदरीनाथ धाम को मोक्ष का धाम भी कहा जाता है। इस धाम की विशेषता यह है कि इसे सत युग में मुक्ति प्रदा, त्रेता में योग सिद्धिदा, द्वापर में विशाला ओर कलियुग मे बदरीकाश्रम नाम से पहचान मिली है। शास्त्रों में इसकी प्रमाणिकता के लिए लिखा गया है।
बदरीकाश्रम धाम को सभी धामों में प्रमुख धाम, सभी तीर्थों में उत्तम तीर्थ पुराणों में कहा गया है। इसे आठवां भू बैकुंठ भी कहा गया है। शास्त्रों में बदरीनाथ के बारे में कहा गया है कि
बहूनि सन्ति तीर्थानि, दिवि भूमौ रसासु च।
बदरी सदृशं तीर्थ, न भूतं न भविष्यति।।

कहां है बदरीनाथ धाम
समुद्र सतह से साढे़ दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बदरीनाथ धाम उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। गंद मादन पर्वत श्रृंख्ला में नर नारायण के मध्य नारायण पर्वत पर भगवान बदरीविशाल विराजित हैं। इनके चरणों को धोने के लिए अलकनंदा नदी बहती है। भगवान बदरी विशाल अर्थात श्री विष्णु यहां मंदिर में पदमासन्न मुद्रा में हैं।

भगवान का विग्रह
भगवान बदरीविशाल अर्थात श्री हरि की बदरीनाथ में अद्भूत मूर्ति या विग्रह है। प्राय: भगवान विष्णु की मूर्ति क्षीर सागर में शेषनाग पर लेटे हुए अथवा शंखचक्र, पदम लिए खड़े रूप में दिखती है, लेकिन बदरीनाथ में भगवान का अद्भूत विग्रह है यहां भगवान पदमासन्न में बैठे हैं। काले शालीग्राम शीला पर भगवान की स्वंय भू मूर्ति अथवा विग्रह है। जब भगवान का श्रृंगार होता है तो छवि देखने लायक होती है। स्वर्ण सिंहासन होता है। सिर पर सोने के मुकुट भाल पर हीरे का तिलक होता है और दिव्य वस्त्रों से सुसज्जित रहते हैं। साथ में भगवती लक्ष्मी, उद्वव जी, देवताओं के खजांची कुबेर जी तथा नारद जी का विग्रह होता है। इसे बद्रीश पंचायत भी कहते हैं।

मंदिर के बारे में
मंदिर का मुख्य आकर्षण भगवान का विग्रह तो है ही साथ ही विशाल सिंहद्वार मंदिर का प्रवेश द्वार है जहां पर लकड़ी की नक्काशी है। गढ़वाल के प्रसिद्ध चित्रकार मोला राम ने भी इसे अलंकृत किया है। प्रवेश द्वार को महारानी अहिल्याबाई ने भी विशाल रूप दिया।

कैसे पड़ा बदरी नाम
मान्यता है कि भगवती लक्ष्मी जो उनकी पत्नी हैं, ने भगवान श्री हरि की साधना के समय बैर के पेड़ के रूप में आकर उन्हें छाया प्रदान की, वही बैर जिसे संस्कृत में वैर का नाम दिया गया उसी से इनका नाम बदरीनाथ पड़ा।

कैसे पहुंचे श्री बदरीनाथ धाम
बदरीनाथ दिल्ली से 528 किमी की दूरी पर है। दिल्ली, यूपी या अन्य राज्यों से बदरीनाथ आने के लिए रेल मार्ग से हरिद्वार, ऋषिकेश तक पहुंचा जा सकता है। इसके बाद सड़क मार्ग से बदरीनाथ आ सकते हैं। अब बदरीनाथ हेलीपैड तक हेलीकॉप्टर सेवा है।

कहां ठहरें
यदि सीधे दिल्ली से आ रहे है तो एक दिन ऋषिकेश, देहरादून, हरिद्वार रूका जा सकता है। दूसरे दिन वाहनों से सीधे बदरीनाथ आ सकते हैं, रास्ते में अन्य तीर्थ स्थल हैं। इन स्थानों पर ठहरने के लिए होटल लॉज हैं।
बदरीनाथ में 60 से अधिक लॉज, धर्मशाला होटल अतिथि गृह हैं। बदरीनाथ में गढ़वाल मंडल के दो बडे़ अतिथि गृह हैं। प्राइवेट होटलों की भी व्यवस्था भी है। श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के भी अतिथि गृह हैं।

एडवायजरी
बदरीनाथ हिमालयी धाम है। शाकाहारी भोजन यहां की पहचान है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित इस धाम में गर्म कपड़े लाएं।बरसाती, छाता, लाठी अपने साथ जरूर लाएं।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आने लिए दवाइयां साथ लाएं।
भारी भरकम सामान लेकर न आएं। शूज कपड़ों के हो तो सही रहेगा।
अपने साथ प्लास्टिक या कांच से बना सामान न लाएं।
हिमालयी पर्यावरण को बचाने के लिए प्लास्टिक कांच की वस्तुओं से दूर ही रहा जाए तो उचित है।


कब करें यात्रा
बदरीनाथ धाम के कपाट इस बार 11 मई को खुल रहे हैं। लिहाजा मई, जून और जुलाई प्रथम, द्वितीय सप्ताह तक मौसम अनुकूल होता है। जौलाई द्वितीय सप्ताह से लेकर अगस्त तृतीय सप्ताह तक बरसात होती है। उस समय भूस्खलन से मार्ग अवरूद्ध होने की आशंका रहती है। पुन: अगस्त के अंतिम सप्ताह से लेकर अक्तूबर तृतीय सप्ताह तक बदरीनाथ की यात्रा अनुकूल होती है। बरसात में भले ही थोड़ा परेशानी कभी कभार हो जाए, लेकिन इस समय हिमालय का हरित सौंदर्य निखरता है।

बदरीनाथ धाम के बारे में जानिये खास बातें
भगवान बदरी विशाल के दर्शन के बाद जीवन में कुछ भी शेष की आकांक्षा नहीं रहती है।
बदरीनाथ में ब्रह्म कपाल तीर्थ है, यहां पर पितृों को पिंड तर्पण दिया जाता है। कहा जाता है कि बदरीनाथ में ब्रह्म कपाल में पिंड तर्पण के बाद कहीं और पिंड तर्पण करने की आवश्यकता नहीं होती।
बदरीनाथ में गर्म पानी के दो बडे कुंड हैं। जहां पर अनादि काल से गर्म पानी आ रहा है। इन्हीं कुंडों में स्नान के बाद भगवान के दर्शन करने की परंपरा है।
भगवान बदरी विशाल के मंदिर परिसर में ही मां लक्ष्मी का मंदिर है। जहां कपाट खुलने के बाद मां लक्ष्मी विराजती हैं।
बदरीनाथ में ऋषिगंगा पार करने के बाद बामणी गांव है, जहां पर श्री हरि ने बालक रूप में बाल क्रीड़ा की थी, उसे लीला डुंगी कहा जाता है। यह जगह आज भी है।
बदरीनाथ मंदिर परिसर में घंटाकर्ण जो क्षेत्र के रक्षा पाल हैं, का भी विग्रह है और माणा गांव में इनका भव्य मंदिर भी है।
बदरीनाथ से तीन किमी दूर भारत का आखिरी गांव माणा है जिसे शास्त्रों में मणीभद्र पुर कहा जाता है। यहां पर व्यास गुफा और गणेश गुफा भी है। कहा जाता है कि व्यास जी ने यहीं पर वेदों की रचना की और भगवान गणेश ने वेदों को लिपिबद्ध किया।
बदरीनाथ धाम में ही शेषनाग की भी एक पत्थर पर अद्भूत आकृति है, जिसका दर्शन पुण्य माना जाता है।
बदरीनाथ मंदिर के पीछे नारायण पर्वत पर चरण पादुका तीर्थ है। यहां पर भगवान के चरणों के चिह्न हैं।
बदरीनाथ जैसे पवित्र धाम की शोभा और गरिमा को विशाल नीलकंठ पर्वत अद्भुत बनाता है। बारह महीने बर्फ से लकदक इस नीलकंठ पर्वत पर शिव की आकृति सब को चमत्कृत कर देती है।
बदरीनाथ पहुंचने के 45 किमी पहले जोशीमठ में भगवान नरसिंह की मूर्ति है। नरसिंह मंदिर में भगवान नरसिंह की शालीग्राम शीला पर विरासन्न पर बैठी मूर्ति है। यहां पर नव दुर्गा मंदिर भी है। आदि गुरू शंकराचार्य ने इस धाम में साधना की थी। उन्हें जो दिव्य ज्ञान ज्योति मिली थी वह ज्योर्तिमठ ही है। इसे अब जोशीमठ कहा जाता है।
यहां से 40 किमी तपोवन मार्ग पर भविष्य बदरी भी है। जहां पर भगवान भविष्य में दर्शन देंगे।
बदरीनाथ से तीस किमी पहले पांडुकेश्वर पवित्र स्थान है, जहां पर ध्यान बदरी मंदिर है। यहां पर कुबेर का भी मंदिर है। यहां से दो किमी पहले गोविंद घाट से पहले हेमकुंड, लक्ष्मण मंदिर पहुंचा जा सकता है।

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बदरीनाथ धाम
बदरीनाथ धाम राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। हिमालयी धाम के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के नंबूदरीपाद होते हैं। पूजा में कैसर कश्मीर से, भगवान के श्रृंगार के लिए चंदन तमिलनाडु से, चना दाल गुजरात से तथा गाढा का कपड़ा उत्तर पूर्व से आता है।
यहां मुसलिम भक्त बदरूद्दीन की संस्कृत में लिखी आरती श्रद्धापूर्वक गाई जाती है। इसके बोल श्री बदरीनाथ विशंबरम... हैं।
आद्य जगतगुरू शंकराचार्य ने भारत वर्ष की चार दिशाओं में चारधाम व चार मठों की स्थापना की। इनमें हिमालय में बदरीनाथ धाम है। इसका मठ ज्योतिर्मठ जोशीमठ में है। यहां का वेद अथर्वेद है। यहां पहले आचार्य त्रोटकाचार्य नियुक्त हुए।
द्वारिका धाम का मठ शारदामठ है। इसका वेद सामवेद है। हस्त मालक स्वामी वहां के मठाधीश हुए।
जगन्नाथ धाम में गोवर्धन मठ है, वहां का वेद ऋग्वेद है। वहां के पहले आचार्य पदमपाद हैं।
दक्षिण रामेश्वर का धाम श्रृंगेरी मठ है, यहां का वेद यजुर्वेद है , वहां के प्रथम आचार्य सुरेश्वर हैं।

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