Shani Dev: इन पांच राशियों पर है शनि की टेढ़ी नजर,जानिए आप किन परेशानियों का करेंगे सामना

Shani Dev, aarti, chalisa, Mantra, Puja Vidhi, Shani Effects On Rashi: शनि ग्रह को अनुशासन और न्याय कारक के रूप में जाना जाता है. शनि इस समय अपनी स्वराशि मकर में उल्टी चाल चल रहे हैं, जो 29 सितंबर तक वक्री अवस्था में रहेंगे. ज्योतिष के अनुसार 21 जून को लगने वाला सूर्य ग्रहण (Surya Grahan) में शनि की वक्री चाल का प्रभाव इन 5 राशि वालों पर विशेष रूप से पड़ेगा. इस साल 24 जनवरी को शनि के मकर में प्रवेश करते ही मिथुन और तुला वालों पर शनि की ढैय्या शुरू हो गई और कुंभ, मकर और धनु वालों पर शनि की साढ़े साती चल रही है. इसलिए इन राशि के जातकों को 29 सितंबर तक विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत है. जानिए आपनी राशि के अनुसार आने वाले समय में किन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा...

मिथुन : आप पर शनि की ढैय्या चल रही है. साथ ही शनि इस समय उल्टी चाल चल रहे हैं, जिस कारण आपके लिए 21 जून से लेकर 29 सितंबर तक का समय काफी तनाव पूर्ण रहेगा. आपको अपने कार्यों में सफलता पाने के लिए कड़ी से कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. आप मानसिक तनाव लेने से बचें.

तुला : आपकी राशि पर भी शनि की ढैय्या लगी हुई है. आपके लिए आने वाला समय थोड़ा राहत भरा रहेगा, लेकिन स्वास्थ्य को लेकर आपको सतर्क रहना होगा. बेफजूल के खर्चे करने से बचें. माता की सेहत बिगड़ सकती है.

धनु : आप पर शनि साढ़े साती का अंतिम चरण चल रहा है. शनि की वक्री चाल आपके लिए कष्टकारी है. 21 जून में शनि के साथ ग्रहों की स्थिति कुछ ऐसी बनेगी जिससे आपका आर्थिक बजट कुछ बिगड़ सकता हैं. पैसा अधिक खर्च हो सकता है. सगे संबंधियों का साथ कम मिलेगा.

मकर: आपकी ही राशि में शनि वक्री चाल चल रहे हैं. शनि की आपके कार्यक्षेत्र और पारिवारिक जीवन पर नजर है. 29 सितंबर तक आपको काम को लेकर जरा भी लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए, नहीं तो नुकसान हो सकता है. पति पत्नी के बीच किसी न किसी बात को लेकर मतभेद होता रहेगा. स्वास्थ्य पर ध्यान दें.

कुंभ: आपको गैर जरूरी खर्चे करने से बचना चाहिए. छात्रों को अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना होगा. यात्रा के काफी योग बन रहे हैं, लेकिन नुकसान होने की भी संभावना हैं. आपके जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा. 

 

शनि देव की पूजा में इन बातों का रखें ध्यान

- शनि देव की पूजा शनि की मूर्ति के समक्ष न करें

- शनि के उसी मंदिर में पूजा आराधना करनी चाहिए जहां वह शिला के रूप में हों

- प्रतीक रूप में शमी के या पीपल के वृक्ष की आराधना करनी चाहिए.

- शनि देव के समक्ष दीपक जलाना सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु तेल उड़ेल कर बर्बाद नहीं करना चाहिए.

- जो लोग भी शनि देव की पूजा करना चाहते हैं , उनको अपना आचरण और व्यवहार अच्छा रखना चाहिए.

 

किस प्रकार करें शनि देव की पूजा

- शनिवार के दिन पहले शिव जी की या कृष्ण जी की उपासना करें.

- उसके बाद सायंकाल शनि देव के मन्त्रों का जाप करें

- पीपल के वृक्ष की जड़ में जल डालें,उसके बाद वृक्ष के पास सरसों के तेल का दीपक जलाएं.

- किसी गरीब व्यक्ति को एक वेला का भोजन जरूर कराएं.

- इस दिन भूलकर भी तामसिक आहार ग्रहण न करें.

 

शनि देव को प्रसन्न करने के मंत्र

- "ॐ शं शनैश्चराय नमः"

- "ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः"

- "ॐ शन्नो देविर्भिष्ठयः आपो भवन्तु पीतये। सय्योंरभीस्रवन्तुनः।।"

 

Shani Dev aarti chalisa

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

जयति जयति शनिदेव दयाला।

करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।

माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला।

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।

हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।

पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।

रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

पर्वतहू तृण होई निहारत।

तृणहू को पर्वत करि डारत॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।

कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।

मातु जानकी गई चुराई॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।

मचिगा दल में हाहाकारा॥

रावण की गति-मति बौराई।

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

दियो कीट करि कंचन लंका।

बजि बजरंग बीर की डंका॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।

चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी।

हाथ पैर डरवायो तोरी॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों।

तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।

आपहुं भरे डोम घर पानी॥

तैसे नल पर दशा सिरानी।

भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।

पारवती को सती कराई॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा।

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।

बची द्रौपदी होति उघारी॥

कौरव के भी गति मति मारयो।

युद्ध महाभारत करि डारयो॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।

लेकर कूदि परयो पाताला॥

शेष देव-लखि विनती लाई।

रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना।

जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।

हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा।

सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।

मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।

चोरी आदि होय डर भारी॥

तैसहि चारि चरण यह नामा।

स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

समता ताम्र रजत शुभकारी।

स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै।

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।

दीप दान दै बहु सुख पावत॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

 

दोहा

पाठ शनिश्चर देव को, की हों 'भक्त' तैयार।

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

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