क्या है ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्थापना का सच

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का उल्लेख शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के 18वें अध्याय मे मिलता है। यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले मे स्थित है। यहाँ ज्योतिर्लिंगों के दो रूपो ओंकारेश्वर और (ममलेश्वर)अमलेश्वर की पूजा की जाती है। महादेव के इन 12 ज्योतिर्लिंगों मे शुमार ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का अपने आप मे महत्व है। इस लेख के माध्यम से हम इस ज्योतिर्लिंग से संबन्धित कथा और इसके महत्व को जानने का प्रयास करेंगे।

पुराणो और धार्मिक ग्रंथो मे वर्णित एक प्रसंग के अनुसार एक बार घुमक्कड़ प्रवृति के नारद जी घूमते- घूमते विंध्य पर्वत पर पहुंचे। वहाँ पहुँचने के बाद साक्षात्गिरिराज विंध्य उनके सामने प्रकट हुए और नारद जी से बोले हे नारद ...! आप दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पर्वत पर विराजे है बताइये आपको किसी चीज़ की आवश्यकता है। संसार मे ऐसी कोई वस्तु नही है जो की मेरे पास न हो। औषधि और जड़ी बूटियों से व्याप्त इस पर्वत से श्रेष्ठ इस पूरेसंसार मे कोई नही है। इसलिए “हे मुनिराज नारद ......! आप मुझे बताए की आप को किस चीज़ की आवश्यकता है।“

पर्वतराज विंध्य के इस प्रकार की अभिमानी बातों को सुनकर नारद मुनि कुछ देर तक चुप रहे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद एकाएक उनके मन मे विचार आया की गिरिराज विंध्य के अहंकार को कैसे कम किया जाए। कुछ देर सोचने के बाद नारद जी बोले “हे गिरिराज ...! आप भले ही सभी गुणो से सम्पन्न हो भले ही आपके ऊपर दिव्य औषधि का भंडार हो परंतु देव पर्वत सुमेरु आपसे कई गुना ऊंचा है और इसके दिव्य शिखर का प्रसार देव लोक तक देखा गया है।“

विंध्य पर्वत के अभिमान को चूर करने के लिए जाते-जाते नारद जी बोले कि “मुझे नही लगता कि तुम्हारे शिखर कभी देव लोक तक पहुँच भी पाएंगे।“

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नारद मुनि कि बातों को सुनकर गिरिराज विंध्य क्षुब्ध हो गए और मन ही मन शोक करने लगे। मुनि के जाने के बाद गिरिराज विंध्य ने 6 महीनो तक कठोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। महादेव ने उनकी तपस्या को स्वीकार कर अपने दिव्य दर्शन दिये और गिरिराज विंध्य से उत्तम वर मांगने को कहा। विंध्य ने कहा कि “हे देवो के देव महादेव ......मैं जनता हूँ कि आप अपने भक्तो को वो अभीष्ट वर देते है जो कि उसके लिए आवश्यक है। इसलिय हे ईश्वर आप मुझे ऐसी बुद्धि दे जो कि समस्त कार्यो को कर सके।“

महादेव ने विंध्य को अभीष्ट बुद्धि से अलंकृत किया तत्पश्चात वहाँ कुछ देवगण और ऋषि पधारे और उन्होने महादेव से आग्रह किया कि हे महादेव आप इस सृष्टि के पालनहारी और दूसरों के दुःखो का नाश करने वाले है कृपया अपनी असीम दृष्टि अपने भक्तो पर बनाए रखे और आप इसी पर्वत पर निवास करे।

ऋषियों और देवताओं के आग्रह से महादेव ने उसी विंध्य पर्वत पर शरण ली और ज्योतिर्लिंग के रूप मे स्थापित हो गए। वहाँ स्थित ओंकारेश्वर लिंग दो स्वरूपो मे बट गया जिसमे भगवान ने वास किया उसे ओंकार जबकि जहां से दिव्य ज्योति प्रकट हुई थी उसे परमेश्वर या कमलेश्वर के नाम से जाना जाने लगा।

इस लेख मे हमने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा का सार विधिपूर्वक बताया है। अन्य ज्योतिर्लिंगों के स्थापना संबन्धित कथाएँ आगे के लेख मे पढ़ने को मिलेगी।