घर में क्यों नहीं होना चाहिए पीपल का पेड़?

पीपल के वृक्ष का धार्मिक और ज्योतिषी महत्व है। इस वृक्ष की उपस्थिति घर में खुशहाली और समृद्धि ले कर आती है। ऐसा भी कहा गया है की पीपल के वृक्ष में देवताओं का वास होता है परंतु यह ध्यान रहे कि पीपल का वृक्ष हमेशा घर से  कुछ दुरी पर हो क्योंकि वास्तु शास्त्र के हिसाब से पीपल की छाया घर पर नहीं पड़नी चाहिए इसे बुरा संकेत माना गया है। यही नहीं पीपल का वृक्ष की धार्मिक और ज्योतिष महत्त्व ही नहीं बल्कि आयुर्वेद के दृष्टि से भी इसे एक औषधिय पौधे की संज्ञा दी गई है। अनेकों ऐसे लोग हैं जो कि इसके दूध पत्ती चाय इत्यादि के प्रयोग से सही हो सकते हैं। यह पेड़ अत्यधिक विशाल प्रजाति का है इसकी इतनी लंबी लंबी शाखाएं परिवार के व्यक्तियों को दीर्घायु प्रदान करने के संकेत देती  हैं । इसके साथ ही यह वंश का नाश नही होने देती है। कहा जाता है कि जिस किसी के भी घर पर पीपल का वृक्ष होता है उसके घर पर कभी भी संतान सुख में कोई कमी नहीं आती है।  इसके अतिरिक्त सभी कष्टों का निवारण भी इससे हो जाता है। और व्यक्ति को अपार सुखों की प्राप्ति होती हैं। तो आइए जानते हैं कि इस पीपल के वृक्ष के क्या है चमत्कारिक लाभ और इसके साथ ही इसके औषधि और वैज्ञानिक महत्व को भी हम बताने का प्रयास करेंगे। 
क्या है पीपल के वृक्ष का धार्मिक महत्व
पीपल के वृक्ष को साक्षात देव वृक्ष की संज्ञा दी गई है अर्थात इसमें स्वयं भगवान विष्णु का वास है एक कथा के अनुसार जब महाभारत काल में देवता और असुरों के साझे प्रयासों से समुद्र मंथन किया जा रहा था तो उस समय माता लक्ष्मी की बड़ी बहन दरिद्रा का जन्म  माता लक्ष्मी से पहले हुआ था । परंतु विष्णु जी ने विवाह माता लक्ष्मी से किया जिससे  दरिद्रा नाराज हो गई इस लिए भगवान् विष्णु ने उसे  अपने प्रिय वृक्ष पीपल में वास करने को कहा और भगवान विष्णु ने दरिद्रा से कहा कि मैं समय-समय पर इस पीपल के वृक्ष में आकर तुमसे मिलता रहूँगा। भगवान् के आदेशानुसार दरिद्रा ने पीपल के वृक्ष में निवास किया और ऐसा माना जाता है कि हर शनिवार को भगवान विष्णु स्वयं उसके तने पर विराजमान होते हैं

पीपल के पेड़ का वैज्ञानिक महत्व
पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी वृक्षों में केवल पीपल को प्राणवायु यानि ऑक्सीजन को शुद्ध करने वाले पेड़ों में सर्वोत्तम माना जाता है। पीपल ही एक ऐसा पेड़ है जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता रहता है, जबकि अन्य वृक्ष रात में कार्बन डाईऑक्साइड या फिर नाइट्रोजन गैस छोड़ते हैं। इसके साथ ही पीपल को सबसे बड़ा पर्यावरण हितैषी वृक्ष माना जाता है, क्योंकि पर्यावरण को शुद्ध करने में इसकी अहम भूमिका होती हैं।
पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी वृक्षों में केवल पीपल को प्राणवायु यानि ऑक्सीजन को शुद्ध करने वाले पेड़ों में सर्वोत्तम माना जाता है। पीपल ही एक ऐसा पेड़ है जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता रहता है, जबकि अन्य वृक्ष रात में कार्बन डाईऑक्साइड या फिर नाइट्रोजन गैस छोड़ते हैं। इसके साथ ही पीपल को सबसे बड़ा पर्यावरण हितैषी वृक्ष माना जाता है, क्योंकि पर्यावरण को शुद्ध करने में इसकी अहम भूमिका है।
आयुर्वेदिक औषधि के रूप में भी पीपल के वृक्ष को बहुत ही कारगर माना गया है। इसके औषधीय गुण कई रोगों को दूर करने में सक्षम है। 
श्वास संबंधी बीमारी के लिए है रामबाणः यदि पीपल के पेड़ की छाल का अंदरूनी हिस्सा निकालकर सुखा लें और सूखे हुए इस भाग का चूर्ण बनाकर खाएँ तो इससे श्वास संबंधी दमा रोग समेत कई समस्याएं दूर हो जाती है। इसके अलावा इसके पत्तों का दूध उबालकर पीना दमा के रोग में लाभकारी होता है।

पेट संबंधी विकारों का करता है दूरः पीपल की पत्तियों को पित्त नाशक कहा जाता है। पीपल के पत्ते पेट संबंधी समस्या जैसे गैस और कब्ज़ को दूर करने में सहायक होते हैं। इसके ताजे पत्तों का रस निकालकर पीने से पेट संबंधी विकार दूर हो जाते हैं।

दांतों को बनाएं मोतियों सा चमकदारःपीपल के वृक्ष की टहनियों से दातून करने से दांत मोतियों की तरह सफेद हो जाते हैं। इसके अलावा इससे दांत मजबूत होते हैं और दांत दर्द से राहत पाने के लिए भी यह बेहद अचूक औषधि है।

विष के प्रभाव को करता है कमः किसी व्यक्ति को कोई ज़हरीला जीव-जंतु काट ले तो पीड़ित व्यक्ति को थोड़े-थोड़े समय के अंतराल में पीपल के पत्तों का रस पिलाते रहें। इससे ज़हर का असर कम हो जाता है।

पीपल के पेड़ की पूजा विधि
सूर्योदय से पहले स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाएं।
पीपल की जड़ में गाय का दूध, तिल और चंदन मिला हुआ पवित्र जल अर्पित करें।
जल अर्पित करने के बाद जनेऊ फूल व प्रसाद चढ़ाएं।
धूप-बत्ती व दीप जलाएं।
आसन पर बैठकर या खड़े होकर मंत्र जप करें या इष्ट देवी-देवताओं का स्मरण करें।

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मंत्र :
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
अग्रत: शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नम:।।

आयु: प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम्।
देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गत:।।