पुराणों के अनुसार क्या है नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का रहस्य

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से सृष्टि के आरंभ मे ब्रह्मा, विष्णु और महेश का योगदान सर्वाधिक रहा है। समस्त सिद्धियो को देने वाले महादेव कि आराधना सिर्फ मनुष्य और देवता ही नही अपितु वानर, दैत्य, गंदर्भ,असुर, तथा किन्नर भी करते है। शिव पुराण कि कोटीरूद्र संहिता के अंतर्गत महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के महत्व को बताया गया है। जो कि भारत के अलग-अलग राज्यो मे स्थित है।
इस लेख मे हम जानेंगे कि आखिर क्या है इन ज्योतिर्लिंगों के स्थापना कि कथा साथ ही क्यों है इसकी इतनी महत्ता। इस लेख के माध्यम से हम नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा को विधिपूर्वक बताने का प्रयास करेंगे।
 

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की पौराणिक कथा
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के द्वारिका पूरी से 17 मिल दूर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के संदर्भ में  शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अंतर्गत जओ उल्लेख मिलता है वो की इस प्रकार से है। 
‌दारुका नाम की एक राक्षसी अपने पति दारुक के साथ  वन में रहा करती थी। कहते है कि माँ पार्वती के वरदान से वह अपने साथ उस वन को कहीं भो ले जा सकती थी। जिस कारण उसने पुरे वन में उत्पात मचा रखा था। उस राक्षसी के कृत्य से वन में निवास करने वाले प्राणी, जीव- जंतु अत्यधिक कष्ट झेलते थे। इस सभी कृत्यों से परेशान होकर सभी वन वासी सहायता के लिए ऋषि आर्व के पास पहुंचे। इस पर ऋषि आर्व ने उन दोनों राक्षसों को ऐसा श्राप दिया कि यदि वे दोनों राक्षस पृथ्वी लोक पर हिंसा करेंगे तो उसी समय भस्म हो जाएंगे। जब देवताओं को इसकी ख़बर लगी तो उन्होंने इन राक्षसों पर आक्रमण कर दिया। अब यदि वे दोनों राक्षस देवताओं से पृथ्वी पर युद्ध करते तो भी वे मारे जाते और यदि नही करते तो देवताओं के हाथो मारे जाते। तब दारूका ने उस पुरे वन को उठा कर एक समुद्र के बीच स्थापित कर दिया और अपनी जान बचाई।

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कुछ दिनों के बाद मनुष्यो से भरी कुछ नाव उस समुद्र से होकर गुज़र रही थी। तब इन दोनों राक्षसों ने उसमे बैठे प्रत्येक जन को बंदी बना लिया। उसमे से एक सुप्रियो नाम का बालक भी था जो की शिव भक्त था। उसने वहिं कारागार में ही शिव की स्तुति प्रारंभ कर दी और दूसरों को भी ऐसा करने को कहा। जब दारुक को इस बात का पता चला तो उसने सुप्रियो को मारने के लिए वज्र से प्रहार किया। तभी सुप्रियो ने भगवान् शिव की स्तुति की अपने भक्त की करुण पुकार सुन महादेव उसी क्षण वहां उपस्थित हुए। और वहां उपस्थित सभी राक्षसों का नाश कर दिया और इस वन में सिर्फ अपने भक्तों और मनुष्यों को ही रहने की इजाज़त दी। यह दृश्य देख राक्षस दारुक अपनी पत्नी के पास भाग गया और उससे माँ पार्वती की आराधना करने को कहाँ । इस पर राक्षसी ने माता पार्वती से प्रार्थना कि की  हमारी आने वाली संतानों को उसी वन में आश्रय दिया जाये। जब पार्वती ने महादेव से इस बात का आग्रह किया तो महादेव मान गए। परंतु अपने भक्तों की रक्षा हेतु उसी स्थान पर लिंग रूप में स्थापित हो गए। महादेव का यह स्वरुप संसार में नागेश्वर ज्योतिलिंग के नाम से विख्यात हुआ। 

इस लेख मे हमने द्वारिका में स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कि कथा का सार विधिपूर्वक बताया है। अन्य ज्योतिर्लिंगों के स्थापना संबन्धित कथाएँ आगे के लेख मे पढ़ने को मिलेगी।