कष्टों से मुक्ति दिलाता है ज्येष्ठ भौम प्रदोष व्रत, इस दिन करें ये खास उपाय व सुनें ये कथा

प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat):प्रदोष की पूजा करते समय साधक को भगवान शिव के मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का पाठ करना चाहिए.
प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat): आज 19 मई मंगलवार को प्रदोष व्रत है. हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का काफी महत्व है. पौराणिक रीति रिवाजों के अनुसार, इस दिन माता पार्वती और भोले शंकर की आराधना की जाती है. प्रदोष व्रत का महत्व वार के मुताबिक़ अलग अलग होता है. मंगलवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष को मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष कहा जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने वाले जातकों के संकट कट जाते हैं. अविवाहित यदि इस व्रत को करते हैं तो उन्हें सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है. साथ ही भगवान मृत्युंजय की कृपा से जातक के जीवन पर आने वाला संकट भी कट जाता है.

जाप करें इस मंत्र का:
प्रदोष की पूजा करते समय साधक को भगवान शिव के मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का पाठ करना चाहिए. इसके बाद शिवलिंग पर दूध, जल और बेलपत्र चढ़ाना चाहिए.
कर्ज से मुक्ति दिलाता है भौम प्रदोष का व्रत

माना जाता है कि इस दिन उपवास करने से गोदान का फल मिलता है और उत्तम लोक की प्राप्ति होती है। कहते हैं कि भौम प्रदोष के दिन हनुमान जी की उपासना करने से हर तरह के कर्ज से मुक्ति मिलती है।

मंगल दोष की समस्या से मुक्ति के लिए करें ये उपाय करें

- भौम प्रदोष के दिन शाम को हनुमान जी के सामने चमेली के तेल का दीपक जलाएं।

- उन्हें हलवा पूरी का भोग लगाएं।

- भाव सहित सुन्दरकाण्ड का पाठ करें।

- मंगल दोष की समाप्ति की प्रार्थना करें।

- हलवा पूरी का प्रसाद निर्धनों में बांट दें।

- मंगल दोष की पीड़ा से छुटकारा मिलेगा।

असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए करें ये उपाय

- प्रातःकाल लाल वस्त्र धारण करके हनुमान जी की उपासना करें।

- हनुमान जी को लाल फूलों की माला चढ़ाएं, दीपक जलायें और गुड़ का भोग लगायें।

- ताम्बे का तिकोना टुकड़ा भी अर्पित करें।

- इसके बाद संकटमोचन हनुमानाष्टक का 11 बार पाठ करें।

- गुड़ का भोग बांटें और ग्रहण करें।

- तिकोने टुकड़े को गले में धारण कर लें या अपने पास रख लें।

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कर्ज मुक्ति के लिए ये उपाय करें

- कर्ज मुक्ति का प्रयोग भौम प्रदोष की रात्रि को करें।

- रात्रि को हनुमान जी के समक्ष घी का दीपक जलायें।

- इस दीपक में नौ बातियां लगाएं और हर बाती जलाएं।

- इसके बाद हनुमान जी को उतने लड्डू अर्पित करें, जितनी आपकी उम्र है।

- "हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट" का 11 माला जाप करें।

- सारे लड्डू बांट दें।

भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि

इस दिन व्रती को सुबह उठकर नित्यकर्मों से निवृत होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और पूरे दिन उपवास करना चाहिए। पूरे दिन उपवास के बाद शाम के प्रथम प्रहर में फिर से स्नान करके सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए और उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके शिव जी की पूजा करनी चाहिए । क्योंकि यह भौम प्रदोष व्रत है और भौम प्रदोष में हनुमान जी की भी पूजा भी जरूर करनी चाहिए ।

पूजा के लिए सबसे पहले गंगाजल से उस जगह को शुद्ध करें फिर इसे गाय के गोबर से लिपाई करें। इसके बाद पद्म पुष्प की आकृति को पांच रंगों से मिलाकर चौक को तैयार करें। इसके बाद आप कुश के आसन में उत्तर-पूर्व की दिशा में बैठकर भगवान शिव की पूजा करें। भगवान शिव का जलाभिषेक करें साथ में ऊं नम: शिवाय: का जाप भी करते रहें। इसके बाद विधि-विधान के साथ शिव की पूजा करें फिर इस कथा को सुन कर आरती करें और प्रसाद सभी को बाटें।

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ये है भौम प्रदोष व्रत कथा

स्कंदपुराण के अनुसार प्राचीनकाल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भ देश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह करने के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह दुबारा गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

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