Eid 2020: जानिए ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा के बीच क्या है अंतर

साल में सबसे पहले जो ईद (Eid) आती है, उसे ईद-उल-फित्र (Eid-Ul-Fitr) या मीठी ईद कहते हैं. इसे सेवइयों वाली ईद भी कहा जाता है. यह ईद रोजा (Roza) खत्म होने के बाद मनाई जाती है.
देशभर में ईद-उल-फित्र (Eid-Ul-Fitr) का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. हालांकि इस बार कोरोना वायरस (Coronavirus) के प्रकोप से बचने के लिए जारी रखे गए लॉकडाउन (Lockdown) में सभी अपने घरों में ही इस पर्व को मनाएंगे. ईद-उल-फित्र को मीठी ईद (Sweet Eid) भी कहा जाता है. वहीं इस पर्व के करीब 70 दिन बाद बकरीद (Bakrid) का त्योहार मनाया जाता है. इसको ईद-उल-अजहा (Eid-Ul-Adha) के नाम से भी जाना जाता है. मुस्लिम समुदाय (Muslim Community) में ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा सबसे बड़े त्योहार होते हैं और दोनों त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाए जाते हैं. वैसे दोनों ही त्योहारों को आम बोलचाल की भाषा में ईद ही कहा जाता है. आइए आपको बताते हैं कि ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा यानी मीठी ईद और बकरीद में क्या अंतर होता है.

इस तरह मनाई जाती है ईद-उल-फित्र
इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक साल में सबसे पहले जो ईद आती है, उसे ईद-उल-फित्र या मीठी ईद कहते हैं. इसे सेवइयों वाली ईद भी कहा जाता है. यह ईद रोजा खत्म होने के बाद मनाई जाती है. दरअसल पहली ईद-उल-फित्र पैगंबर मुहम्मद ने सन् 624 ईस्वी में जंग-ए-बदर के बाद मनाई थी.

जकात से गरीबों की होती है मदद

रोजेदार ईद के दिन अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं कि गर्मियों में उन्होंने रोजे रखने की शक्ति दी है. ईद के दिन हर मुसलमान का फर्ज होता है कि वह जकात निकाले. जकात एक खास रकम होती है जिससे गरीबों और जरूरतमंदों की मदद की जाती है. इस दान को जकात उल-फित्र कहते हैं.

क्यों कहते हैं मीठी ईद
ईद की नमाज के बाद परिवार वालों को फितरा दिया जाता है जिसमें 2 किलो ऐसी चीज दी जाती है जिसका प्रतिदिन खाने में इस्तेमाल हो. इसमें गेंहूं, चावल, दाल, आटा कुछ भी हो सकता है. इसे मीठी ईद भी कहते हैं क्योंकि रोजों के बाद ईद-उल-फित्र पर जिस पहली चीज का सेवन किया जाता है, वह मीठी होनी चाहिए. वैसे मिठाइयों के लेन-देन, सेवइयों और शीर खुर्मा के कारण भी इसे मीठी ईद कहा जाता है.

ऐसे मनाई जाती है ईद-उल-अजहा
मीठी ईद के ढाई महीने बाद बकरीद यानी ईद-उल-अजहा आती है. इस ईद को ईद-ए-कुर्बानी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन नियमों के तहत कुर्बानी दी जाती है. बकरीद के दिन दी जाने वाली कुर्बानी को सुन्नत-ए-इब्राहिम कहते हैं क्योंकि इस त्योहार की शुरुआत हजरत इब्राहिम से हुई थी.

जानें धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता है कि एकबार खुदा ने इब्राहिम के ख्वाब में आकर अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी थी. इब्राहिम ने बिना किसी सोच-विचार कर खुदा का हुक्म मानकर अपने बेटे की कुर्बानी देने चल दिए. कुर्बानी देने से पहले इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली और अपने बेटे की कुर्बानी दे दी. जब इब्राहिम ने अपनी आंखों से पट्टी खोली तब उनका बेटा जिंदा खड़ा था लेकिन बेटे की जगह दुंबा (भेड़ जैसा एक जानवर) की कुर्बानी दी गई थी. तभी से कुर्बानी देने की रिवाज शुरू हो गया.

अलग होते हुए भी एक जैसी हैं दोनों ईद
बड़ी ईद (ईद-उल-अजहा) और छोटी ईद (ईद-उल-फित्र) दोनों अलग-अलग होते हुए भी सामाजिक रूप से एक जैसी है. दोनों ईद पर अल्लाह का शुक्रिया अदा किया जाता है और नमाज अदा की जाती है. इसके बाद जकात (दान) दिया जाता है, रिश्तेदारों-संबंधियों के घर जाना और सामाजिक सरोकार के काम किए जाते हैं. हालांकि इस बार कोरोना वायरस के चलते सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए इस पर्व को मनाया जाएगा.

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